Sannyas

संन्यास संसार से पलायन नहीं अपितु सब प्रकार से , शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक रूप से ज्ञानवान, श्रृद्धावान एवं सामर्थ्यवान बनकर निष्काम, आत्मकाम एवं आप्तकाम बनकर सृष्टि के शाश्वत सत्यों की प्रतिष्ठा हेतु अबाधित पुरुषार्थ करना।

गुरु एवं भागवत आज्ञा को सर्वोपरि मानकर, स्वयं की इच्छा, अपेक्षाओं, कामनाओं एवं पूर्वाग्रहों का समर्पण पूर्वक त्याग करने की सतत चेतना को संन्यास कहते हैं।

सब संबंधों में गुरु एवं ब्रह्म संबंध की अनुभूति करते हुए अपनी चेतना को गुरु एवं भगवतचेतना के साथ संयुक्त करते हुए सहजता और सरलता के साथ निरंतर जीवन पथ बढ़ते चले जाना संन्यास है।

हमारे शास्त्रों ने बहुत सारे मंत्रों, श्लोकों, ऋचाओं एवं सूत्रों के माध्यम से संन्यास की महिमा गाई हुई है।

वांग्मय के सभी शास्त्रों में अलग अलग संदर्भों एवं समय पर संन्यास दीक्षा हेतु अनेक उद्धरण उपस्थित हैं।

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥
(मुण्डकोपनिषद् २.३.६)

वे यतिजन जिन्होंने वेदान्त के विज्ञान को सुनिश्चित् रूप से जान लिया है, संन्यासयोग के द्वारा जिनकी बुद्धि शुद्ध हो चुकी है, वे सब अपने अन्तकाल में, मृत्यु के परे जाकर ब्रह्मलोक में सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ।

कतरस्त्वनयोः पूर्वं देवानामेति सात्मताम् । उभयोर्धावतो राजन् सूर्याचन्द्रमसोरिव ।। १ ।।

अष्टकने पूछा- राजन् ! सूर्य और चन्द्रमाकी तरह अपने-अपने लक्ष्यकी ओर दौड़ते हुए वानप्रस्थ और संन्यासी इन दोनोंमेंसे पहले कौन-सा देवताओंके आत्मभाव (ब्रह्म) को प्राप्त होता है ? ।। १ ।।

ययातिरुवाच
अनिकेतो गृहस्थेषु कामवृत्तेषु संयतः।
ग्राम एव वसन् भिक्षुस्तयोः पूर्वतरं गतः ॥ २ ॥

ययाति बोले- कामवृत्तिवाले गृहस्थोंके बीच ग्राममें ही वास करते हुए भी जो जितेन्द्रिय और गृहरहित संन्यासी है, वही उन दोनों प्रकारके मुनियोंमें पहले ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।। २ ।। (महाभारत -आदिपर्व-९२)

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द्वाविमो पुरुषव्याघ्र सूर्यमण्डलभेदिनौ ।
परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः।।
(महाभारत-उद्योगपर्व-अध्याय -३३)

पुरुषश्रेष्ठ! ये दो प्रकारके पुरुष सूर्यमण्डलको भेदकर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होते हैं- योगयुक्त संन्यासी और संग्राममें शत्रुओंके सम्मुख युद्ध करके मारा गया योद्धा ।

अरोषणो यः समलोष्टाश्मकाञ्चनः
प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः ।
निन्दाप्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये
त्यजत्रुदासीनवदेव भिक्षुकः ॥ ६ ॥
महाभारत-उद्योगपर्व-अध्याय -३८

जो क्रोध न करनेवाला, लोष्ट, पत्थर और सुवर्ण को एक-सा समझनेवाला, शोकहीन सन्धि विग्रहसे रहित, निन्दा प्रशंसासे शून्य, प्रिय-अप्रियका त्याग करनेवाला तथा उदासीन है, वही भिक्षुक (संन्यासी) है । ।।६ ॥

विषयान् प्रतिसंगृह्य संन्यासं कुरुते यतिः।
न च तुष्यन्ति राजानः पश्य बुद्धयन्तरं यथा ॥ १०॥
महाभारत-शान्तिपर्व-अध्याय-१७

यत्नशील साधक विषयोंका परित्याग करके संन्यास ग्रहण कर लेता है तो वह संतुष्ट हो जाता है । परंतु विषयभोगोंसे सम्पन्न समृद्धिशाली राजा कभी संतुष्ट नहीं होते। देखो, इन दोनोंके विचारोंमें कितना अन्तर है? ।। १० ।।

अपुण्यपुण्योपरमे ये पुनर्भवनिर्भयाः । शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ।। ५६ ।।
(महाभारत शान्तिपर्व -४७)

पाप और पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनर्जन्मके भयसे मुक्त हुए शान्तचित्त संन्यासी जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन मोक्षरूप परमेश्वरको नमस्कार है ।। ५६ ।।

आश्रम धर्मका वर्णन भीष्म उवाच आश्रमाणां महाबाहो शृणु सत्यपराक्रम चतुर्णामपि नामानि कर्माणि च युधिष्ठिर । १ ॥

भीष्मजी कहते हैं- सत्यपराक्रमी महाबाहु युधिष्ठिर! अब तुम चारों आश्रमोंके नाम और कर्म सुनो ।। १ ।

वानप्रस्थं भैक्ष्यचर्यं गार्हस्थ्यं च महाश्रमम् । ब्रह्मचर्याश्रमं प्राहुश्चतुर्थं ब्राह्मणैर्वृतम् ।। २ ।।

ब्रह्मचर्य, महान् आश्रम गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और भैक्ष्यचर्य (संन्यास) – ये चार आश्रम हैं। चौथे आश्रम संन्यासका अवलम्बन केवल ब्राह्मणोंने किया है ।। २ ।।

जटाधारणसंस्कारं द्विजातित्वमवाप्य च । आधानादीनि कर्माणि प्राप्य वेदमधीत्य च ॥ ३ ॥
सदारो वाप्यदारो वा आत्मवान् संयतेन्द्रियः। वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत् कृतकृत्यो गृहाश्रमात् ॥ ४ ॥

(ब्रह्मचर्य आश्रम में) चूडाकरण-संस्कार और उपनयनके अनन्तर द्विजत्वको प्राप्त हो वेदाध्ययन पूर्ण करके (समावर्तन के पश्चात् विवाह करे, फिर) गार्हस्थ्य आश्रममें अग्निहोत्र आदि कर्म सम्पन्न करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मनस्वी पुरुष स्त्रीको साथ लेकर अथवा बिना स्त्रीके ही गृहस्थाश्रमसे कृतकृत्य हो वानप्रस्थाश्रममें प्रवेश करे ।। ३-४ ।।

तत्रारण्यकशास्त्राणि समधीत्य स धर्मवित् । ऊर्ध्वरेताः प्रव्रजित्वा गच्छत्यक्षरसात्मताम् ।। ५ ।।

वहाँ धर्मज्ञ पुरुष आरण्यकशास्त्रोंका अध्ययन करके वानप्रस्थ धर्मका पालन करें। तत्पश्चात् ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक उस आश्रमसे निकल जाय और विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण कर ले। इस प्रकार संन्यास लेनेवाला पुरुष अविनाशी ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥

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एतान्येव निमित्तानि मुनीनामूर्ध्वरितसाम् । कर्तव्यानीह विप्रेण राजन्नादौ विपश्चिता ॥६॥

राजन्! विद्वान् ब्राह्मणको ऊर्ध्वरिता मुनियोंद्वारा आचरणमें लाये हुए इन्हीं साधनोंका सर्वप्रथम आश्रय लेना चाहिये ।। ६ ।।

चरितब्रह्मचर्यस्य ब्राह्मणस्य विशाम्पते । भैक्षचर्यास्वधिकारः प्रशस्त इह मोक्षिणः ।। ७ ।।

प्रजानाथ! जिसने ब्रह्मचर्यका पालन किया है, उस ब्रह्मचारी ब्राह्मणके मनमें यदि मोक्षकी अभिलाषा जाग उठे तो उसे ब्रह्मचर्य आश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करनेका उत्तम अधिकार प्राप्त हो जाता है ।। ७ ।।

निराशीः स्यात् सर्वसमो निर्भागो निर्विकारवान् । विप्रः क्षेमाश्रमं प्राप्तो गच्छत्यक्षरसात्मताम् ।।

आशा तृष्णाका सर्वथा त्याग करके सबके प्रति समान भाव रखे। भोगोंसे दूर रहे और हृदयमें किसी प्रकारका विकार न आने दे। इन्हीं सब धर्मोके कारण इस आश्रमको ‘क्षेमाश्रम’ (कल्याणप्राप्तिका स्थान) कहते हैं। इस आश्रममें आया हुआ ब्राह्मण अविनाशी ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त कर लेता है ।।

स्वाध्यायशीलः स्थानेषु सर्वेषु समुपस्पृशेत् । त्यागधर्मः पवित्राणां संन्यासं मनुरब्रवीत् ।। १४ ।।
(महाभारत शान्तिपर्व -१५२)

सभी तीर्थस्थानोंमें स्वाध्यायशील होकर स्नान करे। मनुने कहा है कि सर्वत्यागरूप संन्यास सम्पूर्ण पवित्र धर्मोमें श्रेष्ठ है ।। १४ ।।

न दुष्करतं दानान्नातिमातरमाश्रयः । त्रैविद्येभ्यः परं नास्ति संन्यासः परमं तपः ।। ९ ।।
(महाभारत शान्तिपर्व -१६१)

दानसे बढ़कर कोई दुष्कर धर्म नहीं है, माताकी सेवासे बड़ा कोई दूसरा आश्रय नहीं है, तीनों वेदोंके विद्वानोंसे श्रेष्ठ कोई विद्वान् नहीं है और संन्यास सबसे बड़ा तप है ।। ९ ।।

मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितमुक्तबुद्धिः । अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते मनुष्यः ।। ६ ।।
(महाभारत शान्तिपर्व -१९२)

जो बुद्धिको संकल्परहित करके पवित्र हो शास्त्रोक्त विधिके अनुसार मोक्ष- आश्रम (संन्यास) के नियमों का पालन करता है, वह मनुष्य बिना ईंधनकी आगके समान परम शान्त ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ।। ६ ।।

न क्रुद्धयेन प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः । सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।। १४ ।।

जो सम्मान प्राप्त होनेपर हर्षित, अपमानित होनेपर कुपित नहीं होता तथा जिसने सम्पूर्ण प्राणियोंको अभय दान कर दिया है, उसे ही देवता लोग ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ।। १४ ।।

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् । कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ।। १५ ।।

संन्यासी न तो जीवनका अभिनन्दन करे और न मृत्युका ही जैसे सेवक स्वामीके आदेशकी प्रतीक्षा करता रहता है, उसी प्रकार उसे भी कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये ।। १५ ।।

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अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाग् भवेत् । निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भयम् ।। १६ ।

संन्यासी अपने चित्तको राग-द्वेष आदि दोषोंसे दूषित न होने दे। अपनी वाणीको निन्दा आदि दोषोंसे बचावे और सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सर्वथा शत्रुहीन हो जाय। जिसे ऐसी स्थिति प्राप्त हो उसे किसीसे क्या भय हो सकता है? ।। १६ ।।
(महाभारत शान्तिपर्व -२४५)

अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य: । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: ।।

कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ।।

अर्जुन ! लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं हो सकता।

तेजोमयो नित्यमयः पुराणो लोकाननन्तानभयानुपैति भूतानि यस्मान्न त्रसन्ते कदाचित् स भूतानां न त्रसते कदाचित् ।। ३४ ।।

जो ब्रह्मज्ञानमय तेजसे सम्पन्न और पुरातन नित्य-ब्रह्मपरायण है, वह भिक्षु अनन्त एवं निर्भय लोकोंको प्राप्त होता है। जिससे जगत्के प्राणी कभी भयभीत नहीं होते, वह भी संसारके प्राणियोंसे कभी भय नहीं पाता है ।

अगर्हणीयो न च गर्हते ऽन्यान् स वै विप्रः परमात्मानमीक्षेत् । विनीतमोहो व्यपनीतकल्मषो न चेह नामुत्र च सोऽन्नमृच्छति ।। ३५ ।।

जो न तो स्वयं निन्दनीय है और न दूसरोंकी निन्दा करता है, वही ब्राह्मण परमात्माका दर्शन कर सकता है। जिसके मोह और पाप दूर हो गये हैं, वह इस लोक और परलोकके भोगों में आसक्त नहीं होता ।। ३५ ।।

अरोषमोहः समलोष्टकाञ्चनः प्रहीणकोशो गतसंधिविग्रहः । अपेतनिन्दास्तुतिरप्रियाप्रिय- श्चरन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ।। ३६ ।।

ऐसे संन्यासीको रोष और मोह नहीं छू सकते वह मिट्टीके ढेले और सोनेको समान समझता है। पाँच कोशका अभिमान त्याग देता है और संधि-विग्रह तथा निन्दा-स्तुतिसे रहित हो जाता है। उसकी दृष्टिमें न कोई प्रिय होता है न अप्रिय । वह संन्यासी उदासीनकी भाँति सर्वत्र विचरता रहता है ।। ३६ ।।
(महाभारत शान्तिपर्व -२४५)

सर्वसंन्यास: सुखानामिति ॥३८॥
(चरकसंहिता सूत्रस्थान -२५)

सब प्रकार के सुखों में संन्यास ( सर्वस्व त्याग ) श्रेष्ठ है ||

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद् यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये।।8.11।।

वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा।

ओमित्येतत्। शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।9.28।।

इस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।

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संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।।18.1।।

अर्जुन बोले – हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।।18.2।।

श्रीभगवान् ने कहा – (कुछ) कवि (पण्डित) जन काम्य कर्मों के त्याग को “संन्यास” समझते हैं और विचारशील जन समस्त कर्मों के फलों के त्याग को “त्याग” कहते हैं।।

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।5.3।।

जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि, हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है।।

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।5.4।।

बालक अर्थात् बालबुद्धि के लोग सांख्य (संन्यास) और योग को परस्पर भिन्न समझते हैं; किसी एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।।

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।5.5।।

जो स्थान ज्ञानी संन्यासियों द्वारा प्राप्त किया जाता है, उसी स्थान पर कर्मयोगी भी पहुँचते हैं। इसलिए जो पुरुष सांख्य और योग को (फलरूप से) एक ही देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन | अपार सम्वित सुखसागरेस्मिन लीनं परं ब्रम्हणि यस्य चेतः ||
(स्कन्दपुराण -१.२.५५.१४०)

ध्रुव जी जिनका चित्त भगवान में लगा हुआ है , उनका कुल पवित्र हो जाता है और उनकी मां कृतार्थ तो हो जाती है , जहां उस भक्त का जन्म होता है वहां की भूमि तीर्थ हो जाती है।

ततो वैकुण्ठमगमद् भास्वरं तमसः परम् ||२५|| यत्र नारायणः साक्षान्यासिनां परमा गतिः। शान्तानां न्यस्तदण्डानां यतो नावर्तते गतः||२६||
(भागवतपुराण १०-८८)

वैकुण्ठ में स्वयं भगवान् नारायण निवास करते हैं। एकमात्र वे ही उन संन्यासियोंकी परम गति हैं, जो सारे जगत्को अभय दान करके शान्तभावमें स्थित हो गये हैं। वैकुण्ठ में जाकर जीवको फिर लौटना नहीं पड़ता ॥ २६ ॥

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌। तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥

मैं उस परम पुरुष को जान गया हूँ जो सूर्य के समान देदीप्यमान है और समस्त अन्धकार से परे है। जो उसे अनुभूति द्वारा जान जाता है वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है। जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा का कोई अन्य मार्ग नहीं है।

वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो
भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः |
विशोकमन्तःकरणे चरन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ||१||
मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः
पाणिद्वयं भोक्तुममन्त्रयन्तः |
कन्थामिव श्रीमपि कुत्सयन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ||२||
स्वानन्दभावे परितुष्टिमन्तः
सुशान्तसर्वेन्द्रियवृत्तिमन्तः |
अहर्निशं ब्रह्मसुखे रमन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ||३||
देहादिभावं परिवर्तयन्तः
स्वात्मानमात्मन्यवलोकयन्तः |
नान्तं न मध्यं न बहिः स्मरन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ||४||
ब्रह्माक्षरं पावनमुच्चरन्तो
ब्रह्माहमस्मीति विभावयन्तः |
भिक्षाशिनो दिक्षु परिभ्रमन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ||५||

इति श्रीमद्शङ्कराचार्यकृत कौपीनपञ्चकं संपूर्णम् |